
After the Partition of India: Agha Shahid Ali




I
क्या कहूं हाले दर्दे–पिन्हा़नी
वक्त कोताह किस्सा तूलानी
ऐशे–दुनिया से हो गया दिल सर्द
देख कर रंगे–आलमे–फ़ानी
कुछ नहीं जुज़ तिलिस्म–ख्वाबो–ख़याल
गोशे– फ़क्रो–बज़्मे–सुल्तानी
है सरासर फ़रेबे–वहमों–गुमाँ
ताजे–फ़ग़फ़ूरो–तख्ते–खा़कानी
बे–हकी़क़त है शक्ले–मौजे–सराब
जामे–जमशेद व राहे–रैहानी
लफ़्ज़े–मुहमल है नुत्के़–आराबी
हर्फ़े–बातिल है अ़क्ले–यूनानी
एक धोका है लह्ने–दाऊदी
एक तमाशा है हुस्ने–कन्आनी
न करुँ तिश्नगी में तर लबे–खुश्क
चश्मः–ए–खिज़्र का हो गर पानी
लूँ न इकमुश्त ख़ाक के बदले
गर मिले खा़तिमे–सुलैमानी
बहरे– हस्ती बजुज़ सराब नहीं
चश्मः–ए–ज़िन्दगी में आब नही।
II
जिससे दुनिया ने आशनाई की
उसने आख़िर को कज़–अदाई की
तुझ पे भूले कोई अबस ऐ उम्र
तूने की जिससे बेवफाई की
है ज़माना वफ़ा से बेगाना
हाँ कसम मुझको आशनाई की
यह वह बे–मेहर है की इसकी
सुलह में चाशनी लड़ाई की
है यहाँ हज़्जे़–वस्ल से महरूम
जिसको ताक़त न हो जुदाई की
है यहाँ हिफ़्ज़े–वजा़ से मायूस
जिसको आदत न हो गदाई की
खंदः–ए–गुल से बेबका़–तर है
शान हो जिसमें दिलरुबाई की
जिन्स–ए–कासिद से नारवातर है
खूबियाँ जिसमें हो खुदाई की
बात बिगड़ी रही सही अफसोस
आज खा़कानी व सनाई की
रश्के–उर्फी व फ़ख्रे–तालिब मुर्द
असद उल्लाह खाँ गालिब मुर्द
III
बुलबुले–हिंद मर गया हैहात
जिसकी थी बात बात में एक बात
नुक्तादां, नुक्तासंज, नुक्ताशनास
पाक दिल, पाक जात, पाक सिफ़ात
शैख़ और बज़्ला–संजो–शोख़ मिज़ाज
रिंद और मर्जा–ए–करामो–सेका़त
लाख मज़मून और उसका एक ठठोल
सौ तकल्लुफ़ और उसकी सीधी बात
दिल में चुभता था वह अगर बिस्मिल
दिन को कहता दिन और रात को रात
हो गया नक़्श दिल पे जो लिक्खा
कलम उसका था और उसकी दवात
थीं तो दिल्ली में उसकी बातें थीं
ले चलें अब वतन को क्या सौगा़त
उसके मरने से मर गई दिल्ली
मिर्ज़ा नौशा था और शहर बरात
याँ अगर बज़्म थी तो उसकी बज़्म
याँ अगर ज़ात थी उसकी ज़ात
एक रौशन–दिमाग़ था , न रहा
शहर में इक चिराग़ था, न रहा
IV
दिल को बातें जब उसकी याद आएँ
किसकी बातों से दिल को बहलाएं
किसको जाकर सुनाएँ शे‘रो–ग़ज़ल
किससे दादे–सुखनवरी पाएँ
मर्सिया उसका लिखते हैं एहबाब
किससे इस्लाह लें, किधर जाएँ
पस्त मज़मून है नौहा–ए–उस्ताद
किस तरह आसमाँ पे पहुंचाएं
लोग कुछ पूछने को आए हैं
अहले–मय्यत जनाज़ा ठहराएं
लायेंगे फिर कहाँ से ग़ालिब को
सूए–मदफ़न अभी न ले जाएँ
उसको अगलों में क्यूं न देन तरजीह
अहले इंसाफ़ गौ़र फ़रमायें
कुदसी व साइब व असीर व कलीम
लोग जो चाहें उनको ठहराएं
हमने सबका कलाम देखा है
है अदब शर्त मुँह न खुलवाएं
गालिबे–नुक्तादां से क्या निस्बत
ख़ाक को आसमाँ से क्या निस्बत
V
नस्र, हुस्नो–जमाल की सूरत
नज़्म, गंजो–दलाल की सूरत
तहनियत इक निशात की तस्वीर
ताज़ियत इक मलाल की सूरत
का़ल उसका वह आइना जिसमें
नज़र आती थी हाल की सूरत
इसकी तौजीह से पकड़ती थी
शक्ले–इम्काँ महाल की सूरत
इसकी तावील से बदलती थी
रंगे–हिज्राँ विसाल की सूरत
लुत्फे–आगाज़ से दिखाता था
सुखन इसका मआल की सूरत
चश्मे–दौरान से आज छुपती है
अनवरी व कमाल की सूरत
लौहे–इम्काँ से आज मिटती है
इल्मों –फ़ज़्लो–कमाल की सूरत
देखा लो आज फिर न देखोगे
गा़लिबे–बेमिसाल की सूरत
अब न दुनिया में आएँगे यह लोग
कहीं ढूंढें न पाएँगे यह लोग
VI
शहर में जो है सोगवार है आज
अपना बेगाना अश्कबार है आज
नाज़िशे-ख़ल्क का महल न रहा
रिहलते-फ़ख्रे-रोज़गार है आज
था जमाने में एक रंगीन तबा
रुखसते-मौसम-बहार है आज
बारे-एहबाब जो उठाता था
दोशे-एहबाब पर सवार है आज
थी हर इक बात नीशतर जिसकी
उसकी चुप से जिगर फ़िगार है आज
दिल में मुद्दत से थी खलिश जिसकी
वही बर्छी जिगर के पार है आज
दिले-मुज़्तर को कौन दे तस्कीन
मातम-यारे-गमगुसार है आज
तल्खी-ए-गम कही नहीं जाती
जाने-शीरीं भी नागवार है आज
किसको लाते हैं बहरे-दफ़्न कि कब्र
हमातन चश्मे-इन्तिज़ार है आज
ग़म से भरता नहीं दिले-नाशाद
किससे खाली हुआ जहाँनाबाद
VII
नक्दे-मानी का गंजदाँ न रहा
ख्वाने-मज़मून का मेज़बां न रहा
साथ उसके गई बहारे-सुखन
अब कुछ अंदेशा-ए-खिजां न रहा
हुआ एक एक कारवां सालार
कोई सालार-कारवां न रहा
रौनके-हुस्न था बयाँ उसका
गर्म-बाजार-गुलारुखाँ न रहा
इश्क़ का नाम उससे रौशन था
कैसो-फरहाद का निशाँ न रहा
हो चुकी हुस्नो-इश्क़ कि बातें
गुलो-बुलबुल का तर्जुमा न रहा
अहले-हिंद अब करेंगे किस पर नाज़
रश्के-शीराजो-इस्फ़हाँ न रहा
ज़िंदा क्यूं कर रहेगा नामे-मुलुक
बादशाहों का मदहख्वान न रहा
कोई वैसा नज़र नहीं आता
वह जमीं और वह आसमाँ न रहा
उठा गया था जो मायादारे-सुख़न
किसको ठहराएं अब मदार-सुख़न
VIII
क्या है वह जिसमें वह मर्देकार न था
इक ज़माना कि साज़गार न था
शाइरी का किया हक़ इसने अदा
पर कोई उसका हक्गुज़ार न था
बे-सिला मदह, शे’रे-बे-तहसीन
सुखन उसका किसी पे बार न था
नज़ारे-सेल थी जान तक, लेकिन
दराखुरे-हिम्मत-इक्तिदार न था
मुल्को-दौलत से बहरावर न हुआ
जान देने पे इख्तियार न था
खाकसारों से खाकसारी थी
सर्बुलान्दों से इन्किसार न था
ऐसे पैदा कहाँ हैं मस्तो-ख़राब
हमने माना कि होशियार न था
मज़हरे-शाने-हुस्ने-फितरत था
मानी-ए-लफ्जे-आदमीयत था
कुछ नहीं फर्क बागो-जिन्दां में
आज बाबुल नहीं गुलिस्तां में
IX
शहर सारा बना है बीते-हुज़्न
एक यूसुफ़ नहीं जो कन्हान में
मुल्क यकसर हुआ है बेआईन
एक फलातून नहीं जो यूनाँ में
ख़त्म थी इक ज़बान पे शीरीनी
ढूँढते क्या हो सबो -रुम्मां में
हस्र थी इक बयाँ में रंगीनी
क्या धरा है अकीकों-मरजाँ में
लबे-जादू बयाँ हुआ खामोश
गोशे-गुल वा है क्यूं गुलिस्तां में
गोशे-मानी शुनो हुआ बेकार
मुर्ग क्यूं नाराज़ं है बुस्तां में
वह गया जिससे बज़्म थी रौशन
शमा जलती है क्यूं शबिस्ताँ में
न रहा जिससे था फरोगे-नज़र
सुरमा बनता है क्यूं सफ़ाहा में
माहे-कामिल में आगई ज़ुल्मत
आबे-हैवाँ पे छा गई ज़ुल्मत
X
हिंद में नाम पायेगा अब कौन
सिक्का अपना बिठाएगा अब कौन
हमने जानी है इससे कदर-सलफ़
उन पर ईमान लाएगा अब कौन
उसने सब को भुला दिया दिल से
उसको दिल से भुलायेगा अब कौन
थी किसी की न जिसमें गुंजाइश
वह जगह दिल में पायेगा अब कौन
उससे मिलने को याँ हम आते थे
जाके दिल्ली से आयेगा अब कौन
मर गया कद्र्दाने-फहम-सुखन
शे’र हमको सुनाएगा अब कौन
मर गया तिश्नः-ए-मज़ाके-कलाम
हमको घर में बुलाएगा अब कौन
था बिसाते-सुख़न में शातिर एक
हमको चालें बताएगा अब कौन
शे’र में नातमाम है ‘हाली’
ग़ज़ल इसकी बनाएगा अब कौन
क्या बूद-ओ-बाश पूछो हो पूरब के साकिनो
हम को ग़रीब जान के हँस हँस पुकार के
दिल्ली जो एक शहर था आलम में इंतिख़ाब
रहते थे मुंतख़ब ही जहाँ रोज़गार के
उस को फ़लक ने लूट के बरबाद कर दिया
हम रहने वाले हैं उसी उजड़े दयार के
kyaa buudo-baash puuchho ho puurab ke saakino
hum ko gariib jaan ke has has pukaar ke
Dilli jo ek shahar thaa aalam mai intikhaab
rahte the muntakhib hii jahaan rozgaar ke
us ko falak ne luuT ke viiraan kar diyaa
ham rahne vaale hain usii ujray dayaar ke
You the residents of the east who ask me where I come from
You who mock me, considering me poor
Delhi, which was once a select place of the world
Where only the chosen professionals lived
The heavens have looted it, made it a desolation
I am a resident of that deserted wilderness
– Mir Taqi Mir
दिल व दिल्ली दोनों अगर हैं खराब
पर कुछ लुत्फ उस उजड़े घर में भी है
dil va dilli dono agar hai kharaab
par kuchh lutf us ujRe ghar mein bhi hai
– Mir Taqi Mir
दिल्ली के न थे कूचे औराक़-ए-मुसव्वर थे
जो शक्ल नज़र आई तस्वीर नज़र आई
dillii ke naa the kuuche, auraaq-e-musawwar the
jo shaql nazar aai, tasviir nazar aaii
Not the streets of Delhi, these were works of art
Anything that was visible looked like a painting
– Mir Taqi Mir
दीदा-ए गिर्याँ हमारा नहर है
दिल ख़राबा जैसे दिल्ली शहर है
our weeping eyes are a water-channel
the heart is a ruin like the city of Delhi
– Mir Taqi Mir
दिल्ली में आज भीख भी मिलती नहीं उंहें
था कल तलक दिमाग़ जिंहें ताज‐ओ‐तख़्त का
in Delhi, today, they don’t receive even alms,
they who up till yesterday had a mind for crown and throne
– Mir Taqi Mir
Dil-o-Dilli donon agar hain kharaab
P’a kuchh lutf is ujde ghar mein bhi hain
My heart and my Delhi may both be in ruins
There are still some delights in this ravaged home.
– Mir Taqi Mir
इन दिनों गरचे दकन में है बड़ी क़द्र-ए-सुख़न
कौन जाए ‘ज़ौक़’ पर दिल्ली की गलियाँ छोड़ कर
in dinoN garche dakkan meN hai baRii qadr-e-suḳhan
kaun jaa.e ‘zauq’ par dillī kī galiyaaN chhoḌ kar
these days, though poetry is greatly valued in the Deccan
but who, Zauq, should now leave these streets of Delhi
Sheikh Ibrahim Zauq
tazkira dehli-e-marhūm kā ai dost na chheḌ
na sunā jā.egā ham se ye fasāna hargiz
Don’t start the story of the deceased Delhi, O friend
We definitely won’t be able to bear hearing this story
–Altaf Hussain Hali
है अब इस मामूरे में क़हत-ए ग़म-ए उलफ़त असद
हम ने ये माना कि दिल्ली में रहे खावेंगे क्या
hai ab is maamuure meN qaht-e Gam-e ulfat asad
ham ne yih maanaa kih dillii meN rahe khaaveNge kyaa
there is now in this town a dearth scarcity of the grief of love, Asad
Granted that we would remain in Delhi – what will we eat?
–Mirza Asadullah Khan Ghalib
नासदासीन्नोसदासीत्तादानीं नासीद्रजो नो व्योमापरो यत |
किमावरीव: कुहकस्यशर्मन्नम्भ: किमासीद्गहनं गभीरं ||
There was neither non-existence nor existence then;
there was neither the realm of space nor the sky which is beyond.
What stirred? Where? In whose protection?
Was there water, bottomlessly deep?
सृष्टी से पहले सत् नहीं था, असत् भी नहीं
अन्तरिक्ष भी नहीं, आकाश भी नहीं था
छिपा था क्या? कहाँ? किसने ढका था?
उस पल तो, अगम अतल जल भी कहाँ था?
न मृत्युरासीदमृतं न तर्हि न रात्र्या अह्न आसीत्प्रकेतः ।
आनीदवातं स्वधया तदेकं तस्माद्धान्यन्न परः किञ्चनास ॥२॥
There was neither death nor immortality then.
There was no distinguishing sign of night nor of day.
That one breathed, windless, by its own impulse.
Other than that there was nothing beyond.
नहीं थी मृत्यू, थी अमरता भी नहीं
नहीं था दिन, रात भी नहीं
हवा भी नहीं, साँस थी स्वयमेव फिर भी
नही था कोई कुछ भी, परमतत्त्व से अलग या परे भी।।
तम आसीत्तमसा गूहळमग्रे प्रकेतं सलिलं सर्वाऽइदम् ।
तुच्छ्येनाभ्वपिहितं यदासीत्तपसस्तन्महिनाजायतैकम् ॥३॥
Darkness was hidden by darkness in the beginning;
with no distinguishing sign, all this was water.
The life force that was covered with emptiness,
that one arose through the power of heat.
अंधेरे में अंधेरा-मुँदा अँधेरा था
जल भी केवल निराकार जल था
परमतत्त्व था सृजन-कामना से भरा, ओछे जल से घिरा,
वही अपनी तपस्या की महिमा से उभरा ।।
कामस्तदग्रे समवर्तताधि मनसो रेतः प्रथमं यदासीत् |
सतो बन्धुमसति निरविन्दन्हृदि प्रतीष्या कवयो मनीषा ॥४॥
Desire came upon that one in the beginning;
that was the first seed of mind.
Poets seeking in their heart with wisdom
found the bond of existence in non-existence.
परम मन में बीज पहला जो उगा
काम बनकर वह जगा
कवियों ग्यानियों ने जाना
असत् और सत् का निकट संबंध पहचाना ।।
तिरश्चीनो विततो रश्मिरेषामधः स्विदासीदुपरि स्विदासीत् |
रेतोधा आसन्महिमान आसन्त्स्वधा अवस्तात्प्रयतिः परस्तात् ॥५॥
Their cord was extended across.
Was there below? Was there above?
There were seed-placers; there were powers.
There was impulse beneath; there was giving-forth above.
फैले संबंध के किरण धागे तिरछे
परमतत्त्व उस पल ऊपर या नीचे?
वह था बँटा हुआ, पुरुष और स्त्री बना हुआ
ऊपर दाता वही भोक्ता, नीचे वसुधा स्वधा भोग्या ।।
को अद्धा वेद क इह प्र वोचत्कुत आजाता कुत इयं विसृष्टिः |
अर्वाग्देवा अस्य विसर्जनेनाथा को वेद यत आबभूव ॥६॥
Who really knows? Who will here proclaim it?
Whence was it produced? Whence is this creation?
The gods came afterwards, with the creation of this universe.
Who then knows whence it has arisen?
सृष्टी यह बनी कैसे? किससे? आई है कहाँ से?
कोई क्या जानता है? बता सकता है?
देवताओं को नहीं ग्यात, वे आए सृजन के बाद
सृष्टी को रचां है जिसने, उसको जाना किसने? ।।
इयं विसृष्टिर्यत आबभूव यदि वा दधे यदि वा न |
यो अस्याध्यक्षः परमे व्योमन्त्सो अङ्ग वेद यदि वा न वेद ॥७॥
Whence this creation has arisen –
perhaps it formed itself, or perhaps it did not –
the one who looks down on it, in the highest heaven,
only he knows – or perhaps he does not know.
सृष्टी का कौन है कर्ता? कर्ता है वा अकर्ता?
ऊँचे आकाश में रहता, सदा अध्यक्ष बना रहता
वही सचमुच में जानता, या नहीं भी जानता
है किसी को नहीं पता, नहीं पता, नहीं है पता ।।
हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेकासीत ।
स दाधार पृथ्वीं ध्यामुतेमां कस्मै देवायहविषा विधेम ॥
hiraṇyagarbhaḥ samavartatāgre bhūtasya jātaḥ patirekāsīta |
sa dādhāra pṛthvīṃ dhyāmutemāṃ kasmai devāyahaviṣā vidhema ||
HIRANYAGARBHA was present at the beginning;
when born, he was the sole lord of created beings;
he upheld this earth and heaven,
–let us offer worship with an oblation to the divine KA.
था हिरण्य गर्भ सृष्टि से पहले विद्यमान .
वोही तो सारे भूत जाती का स्वामी महान .
जो है अस्तित्वमान धरती आसमान धारण कर.
ऐसे किस देवता की उपासना करे हम हवी देकर?
vah thaa Hiranyagarbh shristi sey pehley vidyamaan
vahi to saarey bhuut jaat ka swami mahaan
jo hai astitvamaan dharti aasmaan dhaaran kar
aisey kis devata ki upaasanaa karen hum havi dekar
– Rig Veda Rig Veda 10.121.1
येन द्यौरुग्रा पृथ्वी च दृढा येन स्वस्तभितं येननाकः ।
यो अन्तरिक्षे रजसो विमानः कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥
yena dayaurugrā parthivī ca darḻhā yena sava satabhitaṃ yenanākaḥ |
yo antarikṣe rajaso vimānaḥ kasmai devāyahaviṣā vidhema ||
By whom the sky was made profound
and the earth solid,
by Whom heaven and the solar sphere were fixed,
who was the measure of the water in the firmament,-
let us offer worship with an oblation to the divine KA
जिस के बल पर तेजोमय है अम्बर .
पृथ्वी हरी भरी स्थापित स्थिर.
स्वर्ग और सूरज भी स्थिर.
ऐसे किस देवता की उपासना करे हम हवी देकर?
jiskey bal par taejomay hai ambar
prithvi hari-bhari sthaapit-sthir
swarg aur suuraj bhi sthir
aisey kis devata ki upaasanaa karen hum havi dekar
– Rig Veda 10.121.5
आपो ह यद बर्हतीर्विश्वमायन गर्भं दधानाजनयन्तीरग्निम ।
ततो देवानां समवर्ततासुरेकःकस्मै देवाय हविषा विधेम ॥
āpo ha yada barhatīrviśvamāyana garbhaṃ dadhānājanayantīragnima |
tato devānāṃ samavartatāsurekaḥkasmai devāya haviṣā vidhema ||
When the vast waters overspread the universe containing the germ and giving birth to AGNI, then was produced the one breath of the gods,
– let us offer worship with an oblation to the divine KA.
गर्भ में अपने अग्नि धारण कर पैदा कर,
व्याप था जल इधर उधर नीचे ऊपर,
जगाचुके वो का एकमेव प्राण बनकर,
ऐसे किस देवता की उपासना करे हम हवी देकर?
garbh mey apney agni dhaaran kar payda kar
vyaapa thaa jal idhar-udhar neechey-ooper
jaga jo devoon ka ekmayv praan ban kar
aisey kis devata ki upaasanaa karen hum havi dekar
– Rig Veda 10.121.7
मा नो हिंसीज्जनिता यः पर्थिव्या यो वा दिवंसत्यधर्मा जजान ।
यश्चापश्चन्द्रा बर्हतीर्जजानकस्मै देवाय हविषा विधेम ॥
mā no hiṃsījjanitā yaḥ parthivyā yo vā divaṃsatyadharmā jajāna |
yaścāpaścandrā barhatīrjajānakasmai devāya haviṣā vidhema ||
May he do us no harm who is the parent of the -earth, or who the unerring support (of the world) begat the heaven, and who generated the vast and delightful waters,
– let us offer worship with an oblation to the divine KA.
ॐ ! सृष्टि निर्माता स्वर्ग रचयिता पूर्वज रखस कर.
सत्य धर्म पालक अतुल जल नियामक रक्षा कर.
फैली हैं दिशाएं बहु जैसी उसकी सब में सब पर,
ऐसे ही देवता की उपासना करे हम हवी देकर,
ऐसे ही देवता की उपासना करे हम हवी देकर.”
ho.. srishti nirmaata swarg rachayta poorvaj raksha kar
satya dharm palak atul jal niyaamak raksha kar
phaili hain dishaayen baahu jaisi uski submey subpar
aisey hi devata ki upaasanaa karen hum havi dekar
aisey hi devata ki upaasanaa karen hum havi dekar
– Rig Veda 10.121.9
न था कुछ तो ख़ुदा था कुछ न होता तो ख़ुदा होता
डुबोया मुझ को होने ने न होता मैं तो क्या होता
हुआ जब ग़म से यूँ बे-हिस तो ग़म क्या सर के कटने का
न होता गर जुदा तन से तो ज़ानू पर धरा होता
हुई मुद्दत कि ग़ालिब मर गया पर याद आता है
वो हर इक बात पर कहना कि यूँ होता तो क्या होता