
Note Autobiographical – 2: Agha Shahid Ali













तज़्किरा देहली-ए-मरहूम का ऐ दोस्त न छेड़
न सुना जाएगा हम से ये फ़साना हरगिज़
दास्ताँ गुल की ख़िज़ाँ में न सुना ऐ बुलबुल
हँसते हँसते हमें ज़ालिम न रुलाना हरगिज़
ढूँढता है दिल-ए-शोरीदा बहाने मुतरिब
दर्द-अंगेज़ ग़ज़ल कोई न गाना हरगिज़
सोहबतें अगली मुसव्वर हमें याद आएँगी
कोई दिलचस्प मुरक़्क़ा न दिखाना हरगिज़
ले के दाग़ आएगा सीने पे बहुत ऐ सय्याह
देख इस शहर के खंडरों में न जाना हरगिज़
चप्पा चप्पा पे हैं याँ गौहर-ए-यकता तह-ए-ख़ाक
दफ़्न होगा न कहीं इतना ख़ज़ाना हरगिज़
मिट गए तेरे मिटाने के निशाँ भी अब तो
ऐ फ़लक इस से ज़्यादा न मिटाना हरगिज़
वो तो भूले थे हमें हम भी उन्हें भूल गए
ऐसा बदला है न बदलेगा ज़माना हरगिज़
जिस को ज़ख़्मों से हवादिस के अछूता समझें
नज़र आता नहीं इक ऐसा घराना हरगिज़
हम को गर तू ने रुलाया तो रुलाया ऐ चर्ख़
हम पे ग़ैरों को तो ज़ालिम न हँसाना हरगिज़
आख़िरी दौर में भी तुझ को क़सम है साक़ी
भर के इक जाम न प्यासों को पिलाना हरगिज़
बख़्त सोए हैं बहुत जाग के ऐ दौर-ए-ज़माँ
न अभी नींद के मातों को जगाना हरगिज़
कभी ऐ इल्म-ओ-हुनर घर था तुम्हारा दिल्ली
हम को भूले हो तो घर भूल न जाना हरगिज़
‘ग़ालिब’ ओ ‘शेफ़्ता’ ओ ‘नय्यर’ ओ ‘आज़ुर्दा’ ओ ‘ज़ौक़’
अब दिखाएगा न शक्लों को ज़माना हरगिज़
‘मोमिन’ ओ ‘अल्वी’ ओ ‘सहबाई’ ओ ‘ममनून’ के ब’अद
शेर का नाम न लेगा कोई दाना हरगिज़
‘दाग़’ ओ ‘मजरूह’ को सुन लो कि फिर इस गुलशन में
न सुनेगा कोई बुलबुल का तराना हरगिज़
रात आख़िर हुई और बज़्म हुई ज़ेर-ओ-ज़बर
अब न देखोगे कभी लुत्फ़-ए-शबाना हरगिज़
बज़्म-ए-मातम तो नहीं बज़्म-ए-सुख़न है ‘हाली’
याँ मुनासिब नहीं रो रो के रुलाना हरगिज़
I
क्या कहूं हाले दर्दे–पिन्हा़नी
वक्त कोताह किस्सा तूलानी
ऐशे–दुनिया से हो गया दिल सर्द
देख कर रंगे–आलमे–फ़ानी
कुछ नहीं जुज़ तिलिस्म–ख्वाबो–ख़याल
गोशे– फ़क्रो–बज़्मे–सुल्तानी
है सरासर फ़रेबे–वहमों–गुमाँ
ताजे–फ़ग़फ़ूरो–तख्ते–खा़कानी
बे–हकी़क़त है शक्ले–मौजे–सराब
जामे–जमशेद व राहे–रैहानी
लफ़्ज़े–मुहमल है नुत्के़–आराबी
हर्फ़े–बातिल है अ़क्ले–यूनानी
एक धोका है लह्ने–दाऊदी
एक तमाशा है हुस्ने–कन्आनी
न करुँ तिश्नगी में तर लबे–खुश्क
चश्मः–ए–खिज़्र का हो गर पानी
लूँ न इकमुश्त ख़ाक के बदले
गर मिले खा़तिमे–सुलैमानी
बहरे– हस्ती बजुज़ सराब नहीं
चश्मः–ए–ज़िन्दगी में आब नही।
II
जिससे दुनिया ने आशनाई की
उसने आख़िर को कज़–अदाई की
तुझ पे भूले कोई अबस ऐ उम्र
तूने की जिससे बेवफाई की
है ज़माना वफ़ा से बेगाना
हाँ कसम मुझको आशनाई की
यह वह बे–मेहर है की इसकी
सुलह में चाशनी लड़ाई की
है यहाँ हज़्जे़–वस्ल से महरूम
जिसको ताक़त न हो जुदाई की
है यहाँ हिफ़्ज़े–वजा़ से मायूस
जिसको आदत न हो गदाई की
खंदः–ए–गुल से बेबका़–तर है
शान हो जिसमें दिलरुबाई की
जिन्स–ए–कासिद से नारवातर है
खूबियाँ जिसमें हो खुदाई की
बात बिगड़ी रही सही अफसोस
आज खा़कानी व सनाई की
रश्के–उर्फी व फ़ख्रे–तालिब मुर्द
असद उल्लाह खाँ गालिब मुर्द
III
बुलबुले–हिंद मर गया हैहात
जिसकी थी बात बात में एक बात
नुक्तादां, नुक्तासंज, नुक्ताशनास
पाक दिल, पाक जात, पाक सिफ़ात
शैख़ और बज़्ला–संजो–शोख़ मिज़ाज
रिंद और मर्जा–ए–करामो–सेका़त
लाख मज़मून और उसका एक ठठोल
सौ तकल्लुफ़ और उसकी सीधी बात
दिल में चुभता था वह अगर बिस्मिल
दिन को कहता दिन और रात को रात
हो गया नक़्श दिल पे जो लिक्खा
कलम उसका था और उसकी दवात
थीं तो दिल्ली में उसकी बातें थीं
ले चलें अब वतन को क्या सौगा़त
उसके मरने से मर गई दिल्ली
मिर्ज़ा नौशा था और शहर बरात
याँ अगर बज़्म थी तो उसकी बज़्म
याँ अगर ज़ात थी उसकी ज़ात
एक रौशन–दिमाग़ था , न रहा
शहर में इक चिराग़ था, न रहा
IV
दिल को बातें जब उसकी याद आएँ
किसकी बातों से दिल को बहलाएं
किसको जाकर सुनाएँ शे‘रो–ग़ज़ल
किससे दादे–सुखनवरी पाएँ
मर्सिया उसका लिखते हैं एहबाब
किससे इस्लाह लें, किधर जाएँ
पस्त मज़मून है नौहा–ए–उस्ताद
किस तरह आसमाँ पे पहुंचाएं
लोग कुछ पूछने को आए हैं
अहले–मय्यत जनाज़ा ठहराएं
लायेंगे फिर कहाँ से ग़ालिब को
सूए–मदफ़न अभी न ले जाएँ
उसको अगलों में क्यूं न देन तरजीह
अहले इंसाफ़ गौ़र फ़रमायें
कुदसी व साइब व असीर व कलीम
लोग जो चाहें उनको ठहराएं
हमने सबका कलाम देखा है
है अदब शर्त मुँह न खुलवाएं
गालिबे–नुक्तादां से क्या निस्बत
ख़ाक को आसमाँ से क्या निस्बत
V
नस्र, हुस्नो–जमाल की सूरत
नज़्म, गंजो–दलाल की सूरत
तहनियत इक निशात की तस्वीर
ताज़ियत इक मलाल की सूरत
का़ल उसका वह आइना जिसमें
नज़र आती थी हाल की सूरत
इसकी तौजीह से पकड़ती थी
शक्ले–इम्काँ महाल की सूरत
इसकी तावील से बदलती थी
रंगे–हिज्राँ विसाल की सूरत
लुत्फे–आगाज़ से दिखाता था
सुखन इसका मआल की सूरत
चश्मे–दौरान से आज छुपती है
अनवरी व कमाल की सूरत
लौहे–इम्काँ से आज मिटती है
इल्मों –फ़ज़्लो–कमाल की सूरत
देखा लो आज फिर न देखोगे
गा़लिबे–बेमिसाल की सूरत
अब न दुनिया में आएँगे यह लोग
कहीं ढूंढें न पाएँगे यह लोग
VI
शहर में जो है सोगवार है आज
अपना बेगाना अश्कबार है आज
नाज़िशे-ख़ल्क का महल न रहा
रिहलते-फ़ख्रे-रोज़गार है आज
था जमाने में एक रंगीन तबा
रुखसते-मौसम-बहार है आज
बारे-एहबाब जो उठाता था
दोशे-एहबाब पर सवार है आज
थी हर इक बात नीशतर जिसकी
उसकी चुप से जिगर फ़िगार है आज
दिल में मुद्दत से थी खलिश जिसकी
वही बर्छी जिगर के पार है आज
दिले-मुज़्तर को कौन दे तस्कीन
मातम-यारे-गमगुसार है आज
तल्खी-ए-गम कही नहीं जाती
जाने-शीरीं भी नागवार है आज
किसको लाते हैं बहरे-दफ़्न कि कब्र
हमातन चश्मे-इन्तिज़ार है आज
ग़म से भरता नहीं दिले-नाशाद
किससे खाली हुआ जहाँनाबाद
VII
नक्दे-मानी का गंजदाँ न रहा
ख्वाने-मज़मून का मेज़बां न रहा
साथ उसके गई बहारे-सुखन
अब कुछ अंदेशा-ए-खिजां न रहा
हुआ एक एक कारवां सालार
कोई सालार-कारवां न रहा
रौनके-हुस्न था बयाँ उसका
गर्म-बाजार-गुलारुखाँ न रहा
इश्क़ का नाम उससे रौशन था
कैसो-फरहाद का निशाँ न रहा
हो चुकी हुस्नो-इश्क़ कि बातें
गुलो-बुलबुल का तर्जुमा न रहा
अहले-हिंद अब करेंगे किस पर नाज़
रश्के-शीराजो-इस्फ़हाँ न रहा
ज़िंदा क्यूं कर रहेगा नामे-मुलुक
बादशाहों का मदहख्वान न रहा
कोई वैसा नज़र नहीं आता
वह जमीं और वह आसमाँ न रहा
उठा गया था जो मायादारे-सुख़न
किसको ठहराएं अब मदार-सुख़न
VIII
क्या है वह जिसमें वह मर्देकार न था
इक ज़माना कि साज़गार न था
शाइरी का किया हक़ इसने अदा
पर कोई उसका हक्गुज़ार न था
बे-सिला मदह, शे’रे-बे-तहसीन
सुखन उसका किसी पे बार न था
नज़ारे-सेल थी जान तक, लेकिन
दराखुरे-हिम्मत-इक्तिदार न था
मुल्को-दौलत से बहरावर न हुआ
जान देने पे इख्तियार न था
खाकसारों से खाकसारी थी
सर्बुलान्दों से इन्किसार न था
ऐसे पैदा कहाँ हैं मस्तो-ख़राब
हमने माना कि होशियार न था
मज़हरे-शाने-हुस्ने-फितरत था
मानी-ए-लफ्जे-आदमीयत था
कुछ नहीं फर्क बागो-जिन्दां में
आज बाबुल नहीं गुलिस्तां में
IX
शहर सारा बना है बीते-हुज़्न
एक यूसुफ़ नहीं जो कन्हान में
मुल्क यकसर हुआ है बेआईन
एक फलातून नहीं जो यूनाँ में
ख़त्म थी इक ज़बान पे शीरीनी
ढूँढते क्या हो सबो -रुम्मां में
हस्र थी इक बयाँ में रंगीनी
क्या धरा है अकीकों-मरजाँ में
लबे-जादू बयाँ हुआ खामोश
गोशे-गुल वा है क्यूं गुलिस्तां में
गोशे-मानी शुनो हुआ बेकार
मुर्ग क्यूं नाराज़ं है बुस्तां में
वह गया जिससे बज़्म थी रौशन
शमा जलती है क्यूं शबिस्ताँ में
न रहा जिससे था फरोगे-नज़र
सुरमा बनता है क्यूं सफ़ाहा में
माहे-कामिल में आगई ज़ुल्मत
आबे-हैवाँ पे छा गई ज़ुल्मत
X
हिंद में नाम पायेगा अब कौन
सिक्का अपना बिठाएगा अब कौन
हमने जानी है इससे कदर-सलफ़
उन पर ईमान लाएगा अब कौन
उसने सब को भुला दिया दिल से
उसको दिल से भुलायेगा अब कौन
थी किसी की न जिसमें गुंजाइश
वह जगह दिल में पायेगा अब कौन
उससे मिलने को याँ हम आते थे
जाके दिल्ली से आयेगा अब कौन
मर गया कद्र्दाने-फहम-सुखन
शे’र हमको सुनाएगा अब कौन
मर गया तिश्नः-ए-मज़ाके-कलाम
हमको घर में बुलाएगा अब कौन
था बिसाते-सुख़न में शातिर एक
हमको चालें बताएगा अब कौन
शे’र में नातमाम है ‘हाली’
ग़ज़ल इसकी बनाएगा अब कौन
सर में शौक़ का सौदा देखा
देहली को हम ने भी जा देखा
जो कुछ देखा अच्छा देखा
क्या बतलाएँ क्या क्या देखा
जमुना-जी के पाट को देखा
अच्छे सुथरे घाट को देखा
सब से ऊँचे लाट को देखा
हज़रत ‘डिऊक-कनॉट’ को देखा
पलटन और रिसाले देखे
गोरे देखे काले देखे
संगीनें और भाले देखे
बैंड बजाने वाले देखे
ख़ेमों का इक जंगल देखा
उस जंगल में मंगल देखा
ब्रह्मा और वरंगल देखा
इज़्ज़त ख़्वाहों का दंगल देखा
सड़कें थीं हर कम्प से जारी
पानी था हर पम्प से जारी
नूर की मौजें लैम्प से जारी
तेज़ी थी हर जम्प से जारी
डाली में नारंगी देखी
महफ़िल में सारंगी देखी
बैरंगी बारंगी देखी
दहर की रंगा-रंगी देखी
अच्छे-अच्छों को भटका देखा
भीड़ में खाते झटका देखा
मुँह को अगरचे लटका देखा
दिल दरबार से अटका देखा
हाथी देखे भारी-भरकम
उन का चलना कम कम थम थम
ज़र्रीं झूलें नूर का आलम
मीलों तक वो चम-चम चम-चम
पुर था पहलू-ए-मस्जिद-ए-जामे
रौशनियाँ थीं हर-सू लामे
कोई नहीं था किसी का सामेअ’
सब के सब थे दीद के तामे
सुर्ख़ी सड़क पर कुटती देखी
साँस भी भीड़ में घुटती देखी
आतिश-बाज़ी छुटती देखी
लुत्फ़ की दौलत लुटती देखी
चौकी इक चाै-लख्खी देखी
ख़ूब ही चक्खी-पख्खी देखी
हर-सू ने’मत रक्खी देखी
शहद और दूध की मक्खी देखी
एक का हिस्सा मन्न-ओ-सल्वा
एक का हिस्सा थोड़ा हल्वा
एक का हिस्सा भीड़ और बलवा
मेरा हिस्सा दूर का जल्वा
अवज बरीश राजा देखा
परतव तख़्त-ओ-ताज का देखा
रंग-ए-ज़माना आज का देखा
रुख़ कर्ज़न महराज का देखा
पहुँचे फाँद के सात समुंदर
तहत में उन के बीसों बंदर
हिकमत-ओ-दानिश उन के अंदर
अपनी जगह हर एक सिकंदर
औज-ए-बख़्त-ए-मुलाक़ी उन का
चर्ख़-ए-हफ़्त-तबाक़ी उन का
महफ़िल उन की साक़ी उन का
आँखें मेरी बाक़ी उन का
हम तो उन के ख़ैर-तलब हैं
हम क्या ऐसे ही सब के सब हैं
उन के राज के उम्दा ढब हैं
सब सामान-ए-ऐश-ओ-तरब हैं
एग्ज़ीबीशन की शान अनोखी
हर शय उम्दा हर शय चोखी
अक़्लीदस की नापी जोखी
मन भर सोने की लागत सोखी
जशन-ए-अज़ीम इस साल हुआ है
शाही फोर्ट में बाल हुआ है
रौशन हर इक हॉल हुआ है
क़िस्सा-ए-माज़ी हाल हुआ है
है मशहूर-ए-कूचा-ओ-बर्ज़न
बॉल में नाचें लेडी-कर्ज़न
ताइर-ए-होश थे सब के लरज़न
रश्क से देख रही थी हर ज़न
हॉल में चमकीं आ के यका-यक
ज़र्रीं थी पोशाक झका-झक
महव था उन का औज-ए-समा तक
चर्ख़ पे ज़ोहरा उन की थी गाहक
गो रक़्क़ासा-ए-औज-ए-फ़लक थी
उस में कहाँ ये नोक-पलक थी
इन्द्र की महफ़िल की झलक थी
बज़्म-ए-इशरत सुब्ह तलक थी
की है ये बंदिश ज़ेहन-ए-रसा ने
कोई माने ख़्वाह न माने
सुनते हैं हम तो ये अफ़्साने
जिस ने देखा हो वो जाने
sar meñ shauq kā saudā dekhā
dehlī ko ham ne bhī jā dekhā
jo kuchh dekhā achchhā dekhā
kyā batlā.eñ kyā kyā dekhā
jamunā-jī ke paaT ko dekhā
achchhe suthre ghaaT ko dekhā
sab se ūñche laaT ko dekhā
hazrat ”duke-connaught’ ko dekhā
palTan aur risāle dekhe
gore dekhe kaale dekhe
sañgīneñ aur bhāle dekhe
band bajāne vaale dekhe
ḳhemoñ kā ik jañgal dekhā
us jañgal meñ mañgal dekhā
barahmā aur varañgal dekhā
izzat ḳhvāhoñ kā dañggal dekhā
saḌkeñ thiiñ har kamp se jaarī
paanī thā har pump se jaarī
nuur kī maujeñ lamp se jaarī
tezī thī har jump se jaarī
Daalī meñ nārañgī dekhī
mahfil meñ sārañgī dekhī
bairañgī bārañgī dekhī
dahr kī rañgā-rañgī dekhī
achchhe-achchhoñ ko bhaTkā dekhā
bhiiḌ meñ khāte jhaTkā dekhā
muñh ko agarche laTkā dekhā
dil darbār se aTkā dekhā
hāthī dekhe bhārī-bharkam
un kā chalnā kam kam tham tham
zarrīñ jhūleñ nuur kā aalam
mīloñ tak vo cham-cham cham-cham
pur thā pahlū-e-masjid-e-jāme
raushaniyāñ thiiñ har-sū laame
koī nahīñ thā kisī kā sāme.a
sab ke sab the diid ke taame
surḳhī saḌak par kuTtī dekhī
saañs bhī bhiiḌ meñ ghuTtī dekhī
ātish-bāzī chhuTtī dekhī
lutf kī daulat luTtī dekhī
chaukī ik chau-lakhkhī dekhī
ḳhuub hī chakkhī-pakhkhī dekhī
har-sū ne.amat rakkhī dekhī
shahd aur duudh kī makkhī dekhī
ek kā hissa mann-o-salvā
ek kā hissa thoḌā halvā
ek kā hissa bhiiḌ aur balvā
merā hissa duur kā jalva
avaj brīsh raajā dekhā
partav taḳht-o-tāj kā dekhā
rañg-e-zamāna aaj kā dekhā
ruḳh corzon mahrāj kā dekhā
pahuñche phāñd ke saat samundar
tahat meñ un ke bīsoñ bandar
hikmat-o-dānish un ke andar
apnī jagah har ek sikandar
auj-e-baḳht-e-mulāqī un kā
charḳh-e-haft-tabāaqī un kā
mahfil un kī saaqī un kā
āñkheñ merī baaqī un kā
ham to un ke ḳhair-talab haiñ
ham kyā aise hī sab ke sab haiñ
un ke raaj ke umda Dhab haiñ
sab sāmān-e-aish-o-tarab haiñ
egzibshan kī shaan anokhī
har shai umda har shai chokhī
aqlīdas kī naapī jokhī
man bhar sone kī lāgat sokhī
jashn-e-azīm is saal huā hai
shāhī fort meñ ball huā hai
raushan har ik hall huā hai
qissa-e-māzī haal huā hai
hai mash.hūr-e-kūcha-e-barzan
ball meñ nācheñ lady-corzon
tā.ir-e-hosh the sab ke larzan
rashk se dekh rahī thī har zan
hall meñ chamkīñ aa ke yakā-yak
zarrīñ thī poshāk jhkā-jhak
mahv thā un kā auj-e-samā tak
charḳh pe zohra un kī thī gāhak
go raqqāsa-e-auj-e-falak thī
us meñ kahāñ ye nok-palak thī
indr kī mahfil kī jhalak thī
bazm-e-ishrat sub.h talak thī
kī hai ye bandish zehn-e-rasā ne
koī maane ḳhvāh na maane
sunte haiñ ham to ye afsāne
jis ne dekhā ho vo jaane
On the day the world ends
A bee circles a clover,
A fisherman mends a glimmering net.
Happy porpoises jump in the sea,
By the rainspout young sparrows are playing
And the snake is gold-skinned as it should always be.
On the day the world ends
Women walk through the fields under their umbrellas,
A drunkard grows sleepy at the edge of a lawn,
Vegetable peddlers shout in the street
And a yellow-sailed boat comes nearer the island,
The voice of a violin lasts in the air
And leads into a starry night.
And those who expected lightning and thunder
Are disappointed.
And those who expected signs and archangels’ trumps
Do not believe it is happening now.
As long as the sun and the moon are above,
As long as the bumblebee visits a rose,
As long as rosy infants are born
No one believes it is happening now.
Only a white-haired old man, who would be a prophet
Yet is not a prophet, for he’s much too busy,
Repeats while he binds his tomatoes:
There will be no other end of the world,
There will be no other end of the world.
Warsaw, 1944
TRANSLATED BY ANTHONY MILOSZ
“A Song on the End of the World” from The Collected Poems 1931-1987 by Czeslaw Milosz. Copyright © 1988 by Czeslaw Milosz Royalties, Inc. Reprinted by permission of HarperCollins Publishers.Source: The Collected Poems: 1931-1987 (The Ecco Press, 1988)
A day so happy.
Fog lifted early, I worked in the garden.
Hummingbirds were stopping over honeysuckle flowers.
There was no thing on earth I wanted to possess.
I knew no one worth my envying him.
Whatever evil I had suffered, I forgot.
To think that once I was the same man did not embarrass me.
In my body I felt no pain.
When straightening up, I saw the blue sea and sails.
from New & Collected Poems 1931-2001 (Allen Lane, The Penguin Press, 2001), copyright © Czesław Miłosz Royalties Inc., 1988, 1991, 1995, 2001.