‘वास्तविक कानून’ | The Real Law | Naveen Chourey

‘वास्तविक कानून’

इक सड़क पे ख़ून है तारीख़ कोई जून है
एक उँगली है पड़ी और उसपे जो नाख़ून है
नाख़ून पे है इक निशां अब कौन होगा हुक्मरां
जब चुन रही थीं उँगलियाँ ये उँगली भी तब थी वहाँ
फिर क्यों पड़ी है ख़ून में? जिस्म इसका है कहाँ ?
मर गया के था ही न?

कौन थे वो लोग जिनके हाथ में थी लाठियाँ?
कोई अफ़सर था पुलिस का ? न्यायाधीश आये थे क्या?
कौन करता था वक़ालत? फ़ैसला किसने दिया?
या कोई धर्मात्मा था? धर्म के रक्षक थे क्या?
धर्म का उपदेश क्या था? कौन थे वो देवता?

न पुलिस न पत्रकार नागरिक हूँ ज़िम्मेदार
सीधे-सीधे प्रश्न हैं सीधा उत्तर दो मुझे
है सड़क पे ख़ून क्यों ? वो लोग आख़िर कौन थे ?

“आदमी छोटे हैं साहिब, हम का पड़ते बीच में
हम बचाने भी गए थे, तीन पड़ गए खींच के
मोटर साइकल लाये थे, रोड पे कर दी खड़ी
आठ-दस लौंडे-लपाड़े, लाठियाँ इत्ती बड़ी

गाली दे के पूछा, पेट में घूँसा दिया
अधमरा वो गिर पड़ा फिर दे दनादन लाठियाँ
पाँव की हड्डी मिटा दी, माँस की लुगदी बना दी
ख़ून तो इत्ता बहा के हमसे न देखा गया।

एक उनमें होश में था, जाने उसको क्या पड़ी
जेब से चाकू निकाला, उँगली उसकी काट ली
आख़िरी था वार जिसका, उनका वो सरदार था
उसने ही सबको बताया, जो मरा ग़द्दार था

“हक़ नहीं इनको हमारे देश के इक वोट पर
दीमकों को ना रखो ग़र जूतियों की नोंक पर
सर पे ये चढ़ जायेंगे, ये कई गुना बढ़ जायेंगे
हुक्मरां होगा इन्ही का, आग मूतेंगे सभी
पैर के नीचे कुचल दो, जीत होगी धर्म की”

हम तो ख़ुद डर गए थे साहिब, ख़ौफ़ उनको था नहीं
किस नसल के लोग थे वो कुछ समझ आया नहीं

न कोई इंसान उनमें, न कोई था आदमी
साथ मिल के शेर बन गए गीदड़ों की भीड़ थी
नोंच खाने की तलब थी, जानवर तासीर थी
हाथ में थीं लाठियाँ तो भैंस भी उनकी ही थी

और ये कोई जुमला नहीं है, वास्तविक कानून है
हमसे काहे पूछते हो, क्यों सड़क पे ख़ून है?

पूछो इस उँगली से तुम, क्या यहाँ घटना घटी?
ज़ुर्म इसने क्या किया था, जिस्म से ये क्यों कटी ?

मैं तो समझा मर चुकी है उँगली में पर जान थी

स्याही उस नाख़ून पे, जो देश का सम्मान थी
बोली, अब क्या चाहिए, वोट था दे तो दिया
जी रहे थे क़ैद में, मौत दे दी, शुक्रिया
नाख़ून पे जम्हूरियत है,जम गया है ख़ून भी

आप ही तो हो अदालत, आप हो कानून भी
आप से कैसी शिकायत, आप तो हैं नींद में
आप जैसे सौ खड़े थे, जाहिलों की भीड़ में
सौ में से ग़र एक भी दे दे गवाही आपको
मैं ख़ुशी से मान लूँगा भीड़ के इंसाफ़ को

कीजिये इस पर बहस अब पैनलों में बैठकर
क्या हुआ मोहन का वादा? हैं कहाँ अंबेडकर?
सब बराबर हैं अगर तो बस मुझे ही क्यों चुना?
तुम बताओ कौन देगा घर को मेरे रोटियाँ?

असलियत से बेख़बर हो, शहरी हो, दिल्ली से हो
इक हिदायत दे रहा हूँ, सोच के बोला करो
तुम सवालों से भरे हो, क्या तुम्हें मालूम है?
भीड़ से कुछ पूछना भी जानलेवा ज़ुर्म है

तफ़्तीश करने आये हो, खुल के कर लो शौक़ से
फ़र्क पड़ता ही कहाँ है? एक-दो की मौत से
चार दिन चर्चा उठेगी, डेमोक्रेसी लायेंगे
पाँचवें दिन भूल के सब काम पे लग जायेंगे

काम से ही काम रखना हाँ! मग़र ये याद रखना
कोई पूछे कौन थे बस तुम्हें इतना है कहना:
भीड़ थी कुछ लोग थे

फिर भी ग़र कोई ज़िद पकड़ ले:
क्या हुआ किसने किया?

सोच के उँगली उठाना
कट रही हैं उंगलियाँ
बात को कुछ यूँ घुमाना:

नफ़रतों का रोग थे
धर्म न कोई ज़ात उनकी
भीड़ थी कुछ लोग थे