Marsiya Janaab Mirza Asad Ullah Khan Ghalib Marhuum Dehlavi

I
क्या कहूं हाले दर्देपिन्हा़नी
वक्त कोताह किस्सा तूलानी

ऐशेदुनिया से हो गया दिल सर्द
देख कर रंगेआलमेफ़ानी

कुछ नहीं जुज़ तिलिस्मख्वाबोख़याल
गोशे– फ़क्रोबज़्मेसुल्तानी

है सरासर फ़रेबेवहमोंगुमाँ
ताजेफ़ग़फ़ूरोतख्तेखा़कानी

बेहकी़क़त है शक्लेमौजेसराब
जामेजमशेद  राहेरैहानी

लफ़्ज़ेमुहमल है नुत्के़आराबी
हर्फ़ेबातिल है अ़क्लेयूनानी

एक धोका है लह्नेदाऊदी
एक तमाशा है हुस्नेकन्आनी

 करुँ तिश्नगी में तर लबेखुश्क
चश्मःखिज़्र का हो गर पानी

लूँ  इकमुश्त ख़ाक के बदले
गर मिले खा़तिमेसुलैमानी

बहरे– हस्ती बजुज़ सराब नहीं
चश्मःज़िन्दगी में आब नही

II

जिससे दुनिया ने आशनाई की
उसने आख़िर को कज़अदाई की

तुझ पे भूले कोई अबस  उम्र
तूने की जिससे बेवफाई की

है ज़माना वफ़ा से बेगाना
हाँ कसम मुझको आशनाई की

यह वह बेमेहर है की इसकी
सुलह में चाशनी लड़ाई की

है यहाँ हज़्जे़वस्ल से महरूम
जिसको ताक़त  हो जुदाई की

है यहाँ हिफ़्ज़ेवजा़ से मायूस
जिसको आदत  हो गदाई की

खंदःगुल से बेबका़तर है
शान हो जिसमें दिलरुबाई की

जिन्सकासिद से नारवातर है
खूबियाँ जिसमें हो खुदाई की

बात बिगड़ी रही सही अफसोस
आज खा़कानी  सनाई की

रश्केउर्फी  फ़ख्रेतालिब मुर्द
असद उल्लाह खाँ गालिब मुर्द

III

बुलबुलेहिंद मर गया हैहात
जिसकी थी बात बात में एक बात

नुक्तादांनुक्तासंजनुक्ताशनास
पाक दिलपाक जातपाक सिफ़ात

शैख़ और बज़्लासंजोशोख़ मिज़ाज
रिंद और मर्जाकरामोसेका़त

लाख मज़मून और उसका एक ठठोल
सौ तकल्लुफ़ और उसकी सीधी बात

दिल में चुभता था वह अगर बिस्मिल
दिन को कहता दिन और रात को रात

हो गया नक़्श दिल पे जो लिक्खा
कलम उसका था और उसकी दवात

थीं तो दिल्ली में उसकी बातें थीं
ले चलें अब वतन को क्या सौगा़त

उसके मरने से मर गई दिल्ली
मिर्ज़ा नौशा था और शहर बरात

याँ अगर बज़्म थी तो उसकी बज़्म
याँ अगर ज़ात थी उसकी ज़ात

एक रौशनदिमाग़ था ,  रहा
शहर में इक चिराग़ था रहा

IV

दिल को बातें जब उसकी याद आएँ
किसकी बातों से दिल को बहलाएं

किसको जाकर सुनाएँ शेरोग़ज़ल
किससे दादेसुखनवरी पाएँ

मर्सिया उसका लिखते हैं एहबाब
किससे इस्लाह लेंकिधर जाएँ

पस्त मज़मून है नौहाउस्ताद
किस तरह आसमाँ पे पहुंचाएं

लोग कुछ पूछने को आए हैं
अहलेमय्यत जनाज़ा ठहराएं

लायेंगे फिर कहाँ से ग़ालिब को
सूएमदफ़न अभी  ले जाएँ

उसको अगलों में क्यूं  देन तरजीह
अहले इंसाफ़ गौ़र फ़रमायें

कुदसी  साइब  असीर  कलीम
लोग जो चाहें उनको ठहराएं

हमने सबका कलाम देखा है
है अदब शर्त मुँह  खुलवाएं

गालिबेनुक्तादां से क्या निस्बत
ख़ाक को आसमाँ से क्या निस्बत

V

नस्रहुस्नोजमाल की सूरत
नज़्मगंजोदलाल की सूरत

तहनियत इक निशात की तस्वीर
ताज़ियत इक मलाल की सूरत

का़ल उसका वह आइना जिसमें
नज़र आती थी हाल की सूरत

इसकी तौजीह से पकड़ती थी
शक्लेइम्काँ महाल की सूरत

इसकी तावील से बदलती थी
रंगेहिज्राँ विसाल की सूरत

लुत्फेआगाज़ से दिखाता था
सुखन इसका मआल की सूरत

चश्मेदौरान से आज छुपती है
अनवरी  कमाल की सूरत

लौहेइम्काँ से आज मिटती है
इल्मों –फ़ज़्लोकमाल की सूरत

देखा लो आज फिर  देखोगे
गा़लिबेबेमिसाल की सूरत

अब  दुनिया में आएँगे यह लोग
कहीं ढूंढें  पाएँगे यह लोग

VI

शहर में जो है सोगवार है आज
अपना बेगाना अश्कबार है आज

नाज़िशे-ख़ल्क का महल न रहा
रिहलते-फ़ख्रे-रोज़गार है आज

था जमाने में एक रंगीन तबा
रुखसते-मौसम-बहार है आज

बारे-एहबाब जो उठाता था
दोशे-एहबाब पर सवार है आज

थी हर इक बात नीशतर जिसकी
उसकी चुप से जिगर फ़िगार है आज

दिल में मुद्दत से थी खलिश जिसकी
वही बर्छी जिगर के पार है आज

दिले-मुज़्तर को कौन दे तस्कीन
मातम-यारे-गमगुसार है आज

तल्खी-ए-गम कही नहीं जाती
जाने-शीरीं भी नागवार है आज

किसको लाते हैं बहरे-दफ़्न कि कब्र
हमातन चश्मे-इन्तिज़ार है आज

ग़म से भरता नहीं दिले-नाशाद
किससे खाली हुआ जहाँनाबाद

VII

नक्दे-मानी का गंजदाँ न रहा
ख्वाने-मज़मून का मेज़बां न रहा

साथ उसके गई बहारे-सुखन
अब कुछ अंदेशा-ए-खिजां न रहा

हुआ एक एक कारवां सालार
कोई सालार-कारवां न रहा

रौनके-हुस्न था बयाँ उसका
गर्म-बाजार-गुलारुखाँ न रहा

इश्क़ का नाम उससे रौशन था
कैसो-फरहाद का निशाँ न रहा

हो चुकी हुस्नो-इश्क़ कि बातें
गुलो-बुलबुल का तर्जुमा न रहा

अहले-हिंद अब करेंगे किस पर नाज़
रश्के-शीराजो-इस्फ़हाँ न रहा

ज़िंदा क्यूं कर रहेगा नामे-मुलुक
बादशाहों का मदहख्वान न रहा

कोई वैसा नज़र नहीं आता
वह जमीं और वह आसमाँ न रहा

उठा गया था जो मायादारे-सुख़न
किसको ठहराएं अब मदार-सुख़न

VIII

क्या है वह जिसमें वह मर्देकार न था
इक ज़माना कि साज़गार न था

शाइरी का किया हक़ इसने अदा
पर कोई उसका हक्गुज़ार न था

बे-सिला मदह, शे’रे-बे-तहसीन
सुखन उसका किसी पे बार न था

नज़ारे-सेल थी जान तक, लेकिन
दराखुरे-हिम्मत-इक्तिदार न था

मुल्को-दौलत से बहरावर न हुआ
जान देने पे इख्तियार न था

खाकसारों से खाकसारी थी
सर्बुलान्दों से इन्किसार न था

ऐसे पैदा कहाँ हैं मस्तो-ख़राब
हमने माना कि होशियार न था

मज़हरे-शाने-हुस्ने-फितरत था
मानी-ए-लफ्जे-आदमीयत था

कुछ नहीं फर्क बागो-जिन्दां में
आज बाबुल नहीं गुलिस्तां में

IX

शहर सारा बना है बीते-हुज़्न
एक यूसुफ़ नहीं जो कन्हान में

मुल्क यकसर हुआ है बेआईन
एक फलातून नहीं जो यूनाँ में

ख़त्म थी इक ज़बान पे शीरीनी
ढूँढते क्या हो सबो -रुम्मां में

हस्र थी इक बयाँ में रंगीनी
क्या धरा है अकीकों-मरजाँ में

लबे-जादू बयाँ हुआ खामोश
गोशे-गुल वा है क्यूं गुलिस्तां में

गोशे-मानी शुनो हुआ बेकार
मुर्ग क्यूं नाराज़ं है बुस्तां में

वह गया जिससे बज़्म थी रौशन
शमा जलती है क्यूं शबिस्ताँ में

न रहा जिससे था फरोगे-नज़र
सुरमा बनता है क्यूं सफ़ाहा में

माहे-कामिल में आगई ज़ुल्मत
आबे-हैवाँ पे छा गई ज़ुल्मत

X

हिंद में नाम पायेगा अब कौन
सिक्का अपना बिठाएगा अब कौन

हमने जानी है इससे कदर-सलफ़
उन पर ईमान लाएगा अब कौन

उसने सब को भुला दिया दिल से
उसको दिल से भुलायेगा अब कौन

थी किसी की न जिसमें गुंजाइश
वह जगह दिल में पायेगा अब कौन

उससे मिलने को याँ हम आते थे
जाके दिल्ली से आयेगा अब कौन

मर गया कद्र्दाने-फहम-सुखन
शे’र हमको सुनाएगा अब कौन

मर गया तिश्नः-ए-मज़ाके-कलाम
हमको घर में बुलाएगा अब कौन

था बिसाते-सुख़न में शातिर एक
हमको चालें बताएगा अब कौन

शे’र में नातमाम है ‘हाली’
ग़ज़ल इसकी बनाएगा अब कौन

 

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